मौलवियों का इस्लाम और क़ुरान का इस्लाम



मौलवियों का इस्लाम और क़ुरान का इस्लाम
आधुनिक शिक्षित मुसलमान मौलवियों के इस्लाम को ही कुरान का इस्लाम समझते हैं और हर एक से लड़ने को खड़े हो जाते हैं - सही इस्लाम जानने का कुरान के इलावा कोई स्रोत है ही नहीं और कुरान को मतलब समझ कर पढ़ना होगा और उसी क्रम में पढ़ना होगा जिस क्रम में सूरे अवतरित हुए थे - 86 सूरे हिजरत के पूर्व मक्के में अवतरित हुए थे और 28 सूरे हिजरत के बाद मदीने में अवतरित हुए थे - इस्लाम के सभी आदेश इन्हीं 28 सूरों में हैं और इन्हें सिर्फ एक बार नहीं बीसों बार जब पढ़ा जाएगा मतलब समझते हुए और उस वक़्त के हालात को समझते हुए तो कुरान का इस्लाम समझ में आएगा - मेरी पोथी. कॉम पर पुस्तक ' सही इस्लाम की तलाश ' उस सही इस्लाम की व्याख्या करती है I
मैंने शिया परिवार में जन्म लिया और जो शिया मौलवी लगातार अपनी कौम को बता रहे हैं वह निम्नवत है :
1 नमाज़ पढ़ो - मस्जिद में आ कर नमाज़ पढ़ो - नमाज़ जमात में पढ़ो
2 दाढ़ी रखो
3 अपनी माँ, बहनों, बीवी और बेटियों को परदे में रखो
4 तकलीद और ख़ुम्स
इमाम मेहदी अ० के नायब वे मौलाना हैं जो मर्जाह कहलाते हैं - यह ईरान के अय्तोल्लाह हैं और शायद एक ईराक के हैं हर शिया इनमें से किसी एक की तकलीद में रहे I
इन मर्जाह के नायब आप के शहर में होंगे उन्हें तलाश कीजिये और वर्ष में एक बार अपनी दौलत संपत्ति के पांचवें हिस्से को ख़ुम्स के रूप में इन नायब को सौंप दें और अगर कोई आप का करीबी रिश्तेदार जैसे भाई वगैरा गरीब है तो उसे अगर आप मदद करना चाहते हैं तो नायब से इजाज़त ले कर उस ख़ुम्स से उसकी मदद भी कर सकते हैं I
अब आम शिया निकम्मेपन का शिकार है , पतंगबाजी करता है , बच्चों की तालीम से गाफिल है , शादी किये बिना लड़के लड़कियों की उम्र बढती जा रही है और हर एक ऐसे की तलाश में है जो सब से खूबसूरत सब से मालदार और सब से ऊंचे खानदान का हो - इससे नायब को कोई मतलब भी नहीं - इससे भी मतलब नहीं कि शादियों में बहुत ज्यादा खर्च किया जा रहा है और वक़्त भी बर्बाद किया जा रहा है - रात 10-11 बजे के पूर्व निकाह या वलीमा शुरू ही नहीं होता है !
कुरान क्या कहता है ? अल्लाह पर ईमान लाओ , अल्लाह से डरो, क़यामत से डरो, आखिरत से डरो, जहन्नम की आग से डरो जिससे कि बुरे कामों से बचो अच्छे काम करो ! कुरान का इस्लाम बुरे कामों से बचाने और अच्छे काम करवाने के लिए है !
न कुरान में मौलवी तबका बनाने और इसकी इताअत करने को कहता है और न मस्जिदें बनवाने लाउडस्पीकर लगवाने जमात में नमाज़ पढ़ने को कहता है I न दाढ़ी रखने को कहता है और न खतना करवाने को कहता है I न परदे का ऐसा कोई आदेश है कि औरत बिना नमहरम रिश्तेदार के घर के बाहर न निकले I मुसलामानों में जो दाढ़ी पर्दा था वह तो उस वक़्त दुनिया भर में हर जगह था I परदे का सिर्फ यह हुक्म है कि अपने सर को ढांक लो बाक़ी तो मर्द औरत दोनों को हुक्म है अपना बदन ढांपने और नजरें नीची रखने का I
इमाम हुसैन अ० की शहादत के बाद 9 इमाम उनकी नस्ल से हुए जो अलग थलग ज़िन्दगी बसर करते रहे उनके शिया उनके पास आते थे और ख़ुम्स या जो मुमकिन होता होगा इमाम को पेश करते रहे होंगे और उधर मक्के, मदीने और हर शहर में खलीफा, उनके गवर्नर और जीते हुए मुल्क में उनके कमांडर जमात की नमाज़ करवाते थे, जुमे को खुतबा देते थे और जगह जगह मस्जिदें बनवाते थे - यह सब इस्लाम न था और न है और इसलिए हज़रात अली अ० जो पहले इमाम और दुनियावी हिसाब से चौथे खलीफा थे  के बाद अब - न किसी को जिहाद का हक है और न जुमे में खुतबा देने का - जो नमाज़ पढ़नी है घर में पढ़ो और अगर मिल जुल कर मस्जिद में एक साथ पढ़ते हो क्योंकि बहुतों को खुद पढ़ना नहीं आता तो किसी को किसी की इताअत लाजिम नहीं है I ज़ाहिर है कभी कोई इमाम किसी मस्जिद में किसी खलीफा या उसके गवर्नर के पीछे नमाज़ नहीं पढ़ेंगे !
ग्यारहवें इमाम की शहादत के बाद उनके बेटे शियों के हिसाब से पांच वर्ष के थे जो छुप गए - उनके नायब होते थे जिनको शिया जो देना होता था देते थे और जो पूछना होता था उनके ज़रिये पूछते थे और यह सिलसिला करीब 50 वर्ष तक चला उसके बाद नायब होना बंद हो गए I
लेकिन ईरान में शिया हुकूमत बन जाने के बाद और इधर अवध में शिया नवाबी हो जाने के बाद शिया मौलवी सत्ता से मिल गए और कौम का ज़वाल शुरू हो गया !       
मेरी शिक्षित शियों की नयी पीढ़ी को यही सलाह है घर में अपना नमाज़ रोज़ा करो और जब हो हज जियारत करो पर सही रास्ता है आधुनिक शिक्षा हासिल करो कुछ बनो और सब का भला करो ! 
ASTHA - Association of Social Thinkers and Activists - आप manesiro@gmail.com पर ई मेल करें - आपको सामाजिक पुनर्निर्माण Year Book 2018 का ड्राफ्ट प्रेषित किया जाएगा - आप अपने बहुमूल्य विचार इसमें अंत में अंकित कर मुझे पुनर्प्रेषित करें - सभी के विचार संकलित कर के  वर्ष 2018 जनवरी मास के अंत तक इस पुस्तक को प्रकाशित किया जाएगा I इस प्रकार वर्ष प्रति वर्ष यह क्रम चलता रहेगा I
ASTHA एक ऑनलाइन संगठन है जो नि:शुल्क  है और कभी कोई फीस नहीं लेगा - सिर्फ सत्य और ज्ञान की शक्ति से आम नागरिकों को जागृत कर के देश और दुनिया बदल देगा - आप केवल ईमेल द्वारा जुड़े रहें और अपनों को जोड़ें I इन विचारों को समझें  और आगे बढ़ाएं - इन पोस्टों को शेयर करें I

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